सरस्वती शिशु मंदिर गणेश कॉलोनी में तीन दिवसीय संभाग स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न
शिवपुरी। विद्या भारती मध्यभारत प्रांत के मार्गदर्शन में सरस्वती शिशु मंदिर गणेश कॉलोनी, शिवपुरी में आयोजित तीन दिवसीय संभाग स्तरीय प्रभावी शिशु वाटिका–संसाधन उपयोग प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन हुआ। 27 से 29 सितंबर तक आयोजित इस कार्यशाला में संभाग के सात जिलों से 69 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिशु वाटिका में उपलब्ध शैक्षिक व्यवस्थाओं एवं संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर शिक्षण प्रक्रिया को अधिक रुचिकर, गतिविधि आधारित एवं प्रभावी बनाना रहा।
कार्यशाला के दौरान विद्या भारती मध्यभारत प्रांत की मास्टर ट्रेनर्स द्वारा प्रतिभागियों को शिशु वाटिका की विभिन्न व्यवस्थाओं एवं गतिविधियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण में निर्धारित समयानुसार 12 शैक्षिक व्यवस्थाओं के प्रभावी उपयोग, विभिन्न गतिविधियों में आईसीटी के प्रयोग, अभ्यास क्रमानुसार शैक्षिक व्यवस्थाओं के संचालन, इन्द्रिय विकास तथा पंचकोषात्मक अवधारणा की स्पष्टता पर विशेष जोर दिया गया।
प्रशिक्षण के विभिन्न सत्रों में गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति, शिशुओं की आयु एवं आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण सामग्री के उपयोग तथा उपलब्ध संसाधनों को शिक्षा प्रक्रिया से जोड़ने के व्यावहारिक तरीकों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षकों ने बताया कि प्रारंभिक अवस्था में बच्चों को अनुभव, गतिविधि और सहभागिता के माध्यम से सीखने के अधिक अवसर प्रदान किए जाने चाहिए, जिससे उनका सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।
तीन दिवसीय कार्यशाला के दौरान अलग-अलग सत्रों में प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया गया। इस अवसर पर सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश भोपाल के सदस्य एवं शिवपुरी जिले के जिला प्रतिनिधि कुंजबिहारी चतुर्वेदी, ग्राम भारती शिक्षा समिति के प्रांतीय अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रघुवंशी, विनीता जैन, डॉ. पल्लवी गोयल एवं धीरेन्द्र सिंह जादौन का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। प्रशिक्षण सत्रों में शिशु वाटिका की अवधारणा, बाल विकास के विभिन्न आयामों, गतिविधि आधारित शिक्षण, इन्द्रिय विकास एवं पंचकोषात्मक विकास को व्यवहारिक रूप से समझाया गया। प्रतिभागियों ने विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करते हुए प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त जानकारी का अभ्यास भी किया।
आईसीटी के प्रयोग से शिक्षण प्रक्रिया को बनाया जा सकता है अधिक प्रभावी
समापन अवसर पर सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश भोपाल के अध्यक्ष शिरोमणि जी दुबे का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि विद्या भारती छात्रों के पंचकोषात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए पांच आधारभूत विषयों के माध्यम से शिक्षा प्रदान कर उनके सर्वांगीण विकास का प्रयास करती है। वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में आईसीटी का प्रयोग शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी एवं रुचिकर बनाने की दृष्टि से आवश्यक है। इसके लिए आचार्यों एवं दीदियों का निरंतर प्रशिक्षण भी जरूरी है।
उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों से कहा कि कार्यशाला में प्राप्त ज्ञान एवं कौशल को अपने-अपने विद्यालयों में प्रभावी रूप से लागू करें, ताकि शिशु वाटिका के माध्यम से बच्चों के विकास के प्रत्येक पक्ष को उचित दिशा मिल सके।
दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ समापन समारोह का शुभारंभ
समापन समारोह का शुभारंभ मां सरस्वती, ॐ एवं भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर सरस्वती वंदना के साथ किया गया। विद्या भारती की परंपरा एवं रीति-नीति के अनुरूप आयोजित कार्यशाला में प्रशिक्षण के साथ संस्कारयुक्त एवं मूल्य आधारित शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर भी चर्चा की गई।
कार्यशाला के सफल समापन के बाद सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण को उपयोगी एवं व्यवहारिक बताते हुए कहा कि कार्यशाला के माध्यम से शिशु वाटिका की विभिन्न व्यवस्थाओं एवं संसाधनों के प्रभावी उपयोग के साथ आईसीटी एवं गतिविधि आधारित शिक्षण के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।
कार्यशाला में विद्या भारती मध्यभारत प्रांत के शिशु वाटिका प्रांत समूह संयोजक मुकुट बिहारी शर्मा, प्रांत संयोजक सुरेखा ठाकुर, सरस्वती विद्यापीठ आवासीय विद्यालय शिवपुरी के प्रबंधक पवन शर्मा, सह-प्रबंधक जितेन्द्र परसाई, प्राचार्य लोकेंद्र सिंह मेवाड़ा तथा सरस्वती शिशु मंदिर गणेश कॉलोनी की प्राचार्या नम्रता सेंगर सहित प्रशिक्षार्थी, मास्टर ट्रेनर्स एवं अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
तीन दिवसीय प्रशिक्षण के माध्यम से शिशु वाटिका से जुड़े आचार्यों एवं कार्यकर्ताओं को आधुनिक शैक्षिक संसाधनों, गतिविधि आधारित शिक्षण तथा पंचकोषात्मक विकास की अवधारणा को व्यवहार में उतारने का अवसर मिला। कार्यशाला का उद्देश्य प्रशिक्षण तक सीमित न रहकर विद्यालयों में प्राप्त ज्ञान के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से बच्चों के सर्वांगीण एवं संस्कारयुक्त विकास को गति देना रहा।








