केदार "करामाती"
भोपाल। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है- पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। अर्थात् एक बालक की हरकतों, उसके व्यवहार को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका भविष्य कैसा होगा, उसका जीवन किन संस्कारों पर आधारित चलेगा। इसी तरह मामला प्रदेश के एक जिले में हनुमान जी के मंदिर के धू्रत पुजारी के कर्मों से सामने आया है। ध्रूत और पाखण्डी पुजारी ने अपने आपको लालची और बेईमान होने की अनेक मिशालें पेश की है। उसके द्वारा मंदिर की बेशकीमती शासकीय जमीनों को अपने निज स्वार्थ के लिए खुलेआम बेच दिया। और फिर जहां अंधविश्वास और भ्रष्ट प्रशासन हो तो वहां पर इस तरह के ध्रूत पुजारियों को तो ऐसा माना जाता है जैसे कि यही लोगों को सीधे भगवान तक पहुंचाने के लिए ही एकमात्र व्यक्ति हों। पुजारी एक के बाद एक ट्रस्ट की जमीन पर दुकानें बनाकर बेचता गया, लेकिन प्रशासन की क्या मजाल पुजारी को रोकना तो दूर टोका तक भी नहीं। वह तो मेहरबानी हो कमलनाथ सरकार की, कि उसके एक आदेश ने इस पुजारी के अंधभक्तों को सच्चाई जानने का एक और मौका दे दिया। अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत इनके द्वारा बेची गई दुकानों और बेची गई जमीन पर बनी दुकानों एवं स्टालों को तोड़ दिया। नतीजतन लाखों खर्च करने के बाद भी पुजारी की करतूतों से अनजान आज बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए हैं।
भक्ति की शक्ति तो नहीं, लेकिन भक्ति की आड़ में कमाए रुपयों की दम पर पहुंच दमदार
यहां बताना लाजिमी होगा कि धू्रत पुजारी ने भले ही भक्ति की शक्ति अर्जित नहीं की हो और न ही करना चाहता क्योंकि उसने धर्म की आड़ लेकर शासकीय जमीनों को बेचकर करोड़ों कमाकर मनी पॉवर जो बढ़ा ली है। पुजारी की मनी पॉवर का जलवा इतना है कि इसकी ओर न तो पुलिस और न ही प्रशासन अपनी आंखें दिखा पाता है (दबाव में की गई एकाद एफआईआर को छोड़कर)। पुजारी की धोखाधड़ी के शिकार हुए व्यक्ति आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार हैं कि सुनते नहीं..?
आज भी बना हुआ है शासकीय पुजारी
कहावत है- ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फाड़ के देता है, लेकिन यहां यह कहावत ऊपर वाले के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्ट प्रशासन के लिए चरितार्थ हो रही है क्योंकि पुजारी की करतूतों का भंडाफाड़ हो चुका है, लेकिन आज भी प्रशासन पुजारी को ट्रस्टी बनाए हुए है। परिणामस्वरूप पुजारी खुलेआम 20-20 स्टाइल में बल्लेजबाजी कर रहा है और भ्रष्ट अधिकारी अपना हिस्सा ले रहे हैं।
भोपाल। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है- पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। अर्थात् एक बालक की हरकतों, उसके व्यवहार को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका भविष्य कैसा होगा, उसका जीवन किन संस्कारों पर आधारित चलेगा। इसी तरह मामला प्रदेश के एक जिले में हनुमान जी के मंदिर के धू्रत पुजारी के कर्मों से सामने आया है। ध्रूत और पाखण्डी पुजारी ने अपने आपको लालची और बेईमान होने की अनेक मिशालें पेश की है। उसके द्वारा मंदिर की बेशकीमती शासकीय जमीनों को अपने निज स्वार्थ के लिए खुलेआम बेच दिया। और फिर जहां अंधविश्वास और भ्रष्ट प्रशासन हो तो वहां पर इस तरह के ध्रूत पुजारियों को तो ऐसा माना जाता है जैसे कि यही लोगों को सीधे भगवान तक पहुंचाने के लिए ही एकमात्र व्यक्ति हों। पुजारी एक के बाद एक ट्रस्ट की जमीन पर दुकानें बनाकर बेचता गया, लेकिन प्रशासन की क्या मजाल पुजारी को रोकना तो दूर टोका तक भी नहीं। वह तो मेहरबानी हो कमलनाथ सरकार की, कि उसके एक आदेश ने इस पुजारी के अंधभक्तों को सच्चाई जानने का एक और मौका दे दिया। अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत इनके द्वारा बेची गई दुकानों और बेची गई जमीन पर बनी दुकानों एवं स्टालों को तोड़ दिया। नतीजतन लाखों खर्च करने के बाद भी पुजारी की करतूतों से अनजान आज बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए हैं।
भक्ति की शक्ति तो नहीं, लेकिन भक्ति की आड़ में कमाए रुपयों की दम पर पहुंच दमदार
यहां बताना लाजिमी होगा कि धू्रत पुजारी ने भले ही भक्ति की शक्ति अर्जित नहीं की हो और न ही करना चाहता क्योंकि उसने धर्म की आड़ लेकर शासकीय जमीनों को बेचकर करोड़ों कमाकर मनी पॉवर जो बढ़ा ली है। पुजारी की मनी पॉवर का जलवा इतना है कि इसकी ओर न तो पुलिस और न ही प्रशासन अपनी आंखें दिखा पाता है (दबाव में की गई एकाद एफआईआर को छोड़कर)। पुजारी की धोखाधड़ी के शिकार हुए व्यक्ति आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार हैं कि सुनते नहीं..?
आज भी बना हुआ है शासकीय पुजारी
कहावत है- ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फाड़ के देता है, लेकिन यहां यह कहावत ऊपर वाले के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्ट प्रशासन के लिए चरितार्थ हो रही है क्योंकि पुजारी की करतूतों का भंडाफाड़ हो चुका है, लेकिन आज भी प्रशासन पुजारी को ट्रस्टी बनाए हुए है। परिणामस्वरूप पुजारी खुलेआम 20-20 स्टाइल में बल्लेजबाजी कर रहा है और भ्रष्ट अधिकारी अपना हिस्सा ले रहे हैं।







