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"बेईमान मन की खातिर" शिवपुरी में बढ़ता दलाल पटवारियों का "साम्राज्य"

अधिकारियों की हर ख्वाहिश बोलने से पहले पूरा करने में माहिर हैं दलाल पटवारी
जगाने से लेकर सुलाने और घुमाने तक का रखते हैं ख्याल
केदार 'करामाती' शिवपुरी। आज के दौर में किसी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार की बात करें तो इन विभागों में राजस्व का नाम अनायास ही आ ही जाता है क्योंकि यह एक ऐसा विभाग में जिसमें हर किसी को काम पड़ता है। रजिस्ट्री से लेकर नामांतरण हो या फिर अन्य काम बिना दलाली के संभव नहीं है (एकाध दो को छोड़ दिया जाए तो)। दलाली की दम पर यहां सरकारी जमीनों की भी रजिस्ट्री हो सकती है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में चली अतिक्रमण विरोधी मुहिम में भी सामने आ चुका है। क्योंकि यदि जिन जमीनों को सरकारी बताकर तोड़ा गया है तो फिर इन जमीनों की रजिस्ट्री कैसे हो गई है..? यह भी एक बड़ा सवाल है। और यदि रजिस्ट्री सही है तो फिर आपने सरकारी बताकर तोड़ा कैसे, यह भी बड़ा सवाल है..? कुल मिलाकर हम यह कहें कि इन सब सवालों के पीछे दलाल पटवारियों की करतूत है तो इनकार नहीं किया जा सकता है। यह दलाल पटवारी अधिकारियों की चापलूसी से लेकर हर काम को करते है फिर इन्हीं अधिकारियों को विश्वास में लेकर अपने दलाली के कारनामे को अंजाम देते हैं। एक जमीन कारोबारी ने तो अपना नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि मैं तो हर महीने पटवारी को लिफाफा देता हूं। इस पटवारी की खासियत यह है कि वह अधिकारियों के तलबे चाटने में सबसे माहिर है और उनकी हर ख्वाहिश को जुबान पर आने से पहले ही पूरी कर देता है और आखिर ऐसा चापलूस मिलने पर भला मना कर भी कौन सकता है। एक दो पटवारी तो अधिकारी को जगाने से लेकर सुलाने तक की भूमिका में रहते हैं और भले ही अपने बच्चों की ख्वाहिश को भूल जाएं, लेकिन अधिकारियों के बच्चों की ख्वाहिश का भी पूरा ध्यान रखते हैं। 

भूमाफियाओं को सरकारी नालों पर कब्जा कराने में मिलती है बड़ी रकम
यहां बता दें कि शहर में कई भूमाफियाओं द्वारा सरकारी नालों पर कब्जा कर उसे अपनी जमीन बनाकर प्लॉटिंग कर दी गई जिसमें पटवारियों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। नोटों की खनक से इनका मुंह ऐसे बंद होता है जैसे कि यह बेचारे बेजुबान हों। यह ऐसे पटवारियों की एक सोची समझी चाल होती है फिर नाले पर कब्जा कराने के दम पर यह भूमाफियाओं से हफ्ता वसूली चालू कर देते हैं, नहीं देने पर साहब से कहकर कार्यवाही की धमकी देते हैं। अब फिर मरता क्या नहीं करता, मजबूरी में हफ्ता वसूली की ख्वाहिश भी पूरी करनी ही पड़ती है।

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