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क्या मोदी लहर के अलावा भाजपा के स्थानीय नेतृत्व को दिया जा सकता है सिंधिया की हार का श्रेय

  • 2014 में सिंधिया शिवपुरी जिले से जहां 47 हजार मतों से जीते वहीं इस बार 17 हजार मतों से हारे

शिवपुरी। 2014 और 2019 के चुनाव परिणाम में एक समानता यह भी है कि दोनों चुनावो में शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से ज्योतिरादित्य सिंधिया को पराजय हासिल हुई थी। यह बात अलग है कि 2014 में सिंधिया की पराजय जहां महज 4500 मतों की थी वहीं 2019 में पराजय का आंकड़ा बढ़कर 29 हजार से अधिक पहुंच गया। पतीली के एक चावल से यदि आंकलन लगा लिया जाता तो शायद यह स्थिति पैदा नहीं होती। कोलारस विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव में सिंधिया 28 हजार से अधिक मतो से विजयी रहे वहीं इस बार वह उल्टे  3 हजार मतों से पराजित हो गए। हां उनके लिए संतोष की बात यह है कि 2014 में भी वह पिछोर विधानसभा क्षेत्र से विजयी रहे थे और इस बार भी उनका विजय अभियान जारी रहा, लेकिन इसमें भी उनके लिए एक चेतावनी है कि 2014 में जहां वह पिछोर से लगभग 23 हजार मतों से जीते थे। वहीं इस बार उनकी जीत का आंकड़ा सिकुड़कर 15 हजार मतों पर आ गया। अर्थात शिवपुरी जिले की तीनों विधानसभा क्षेत्रों में सिंधिया का ग्राफ नीचे आता हुआ साफ महसूस हुआ। क्या इसे सिर्फ मोदी लहर का असर कहा जाए अथवा सिंधिया की इस पराजय के और भी कारण हैं, यह मंथन का विषय है, लेकिन भाजपा का स्थानीय नेतृत्व जो पार्टी प्रत्याशी के प्रचार में जुटा रहा वह इसका कुछ न कुछ श्रेय अवश्य लेने का प्रयास कर रहा है। सिंधिया के खिलाफ में स्थितियों को भुनाने में उनका कुछ न कुछ योगदान है भी। हां इसके बाद भी भाजपा की गुटबाजी चुनाव में खुलकर सामने आई। 
सबसे पहले शिवपुरी शहर की बात करें तो 2014 के चुनाव में मोदी लहर में शिवपुरी शहर से कांग्रेस उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया को 18 हजार मतों की अनापेक्षित पराजय झेलना पड़ी। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सिंधिया परिवार की लोकप्रियता कायम रही और सिंधिया ने ग्रामीण क्षेत्र में से बढ़त बनाकर हार को संकुचित किया तथा पूरे विधानसभा क्षेत्र से सिंधिया महज 4500 मतों से भाजपा उम्मीदवार जयभान सिंह पवैया से पीछे रहे। खास बात यह है कि 2014 में भाजपा ने चुनाव पूरी दम और ताकत से लड़ा था। भाजपा प्रत्याशी पवैया जीत की मानसिकता के साथ मैदान में आए थे और स्थानीय भाजपा भी उनके कदम से कदम मिलाकर जीत के प्रयास में लगी हुई थी। उस चुनाव की तुलना में 2019 में भाजपा राजनैतिक शतरंज की चौंसर पर मुकाबले में कहीं नजर नहीं आ रही थी। भाजपा प्रत्याशी केपी यादव को भी कमजोर इसलिए माना जा रहा था, क्योंकि वह सालभर पहले ही पार्टी में आए थे और सिंधिया के कट्टर अनुयायी रहे थे। उनके बारे में यह भी अफवाह फैलती रही कि बसपा प्रत्याशी लोकेंद्र धाकड़ की तरह वह कभी भी सिंधिया शरणम गच्छामि हो जाएंगे। लेकिन इससे इतर स्थानीय भाजपा के कुछ नेता जीत की रणनीति बनाने में जुटे रहे और उनका प्रयास रहा कि भले ही चुनाव भाजपा जीत न पाए, लेकिन पिछले चुनाव की तुुलना में सिंधिया की जीत का अंतर कम अवश्य कर दें। भाजपा की कमजोर रणनीति के कारण यह भी एक बड़ा सवाल था कि चुनाव की कमान किसे सौंपी जाए। बड़े बड़े नेता जिम्मेदारी लेने से बच रहे थे। ऐसे में आउट डेटेड नरेंद्र बिरथरे और पार्टी के काम को सर्वोपरि मानने वाले राजू बाथम ने कमान संभाली। जिलाध्यक्ष सुशील रघुवंशी नेतृत्व की बागडोर संभाले रहे। इसके बावजूद भाजपा की मुख्य धारा चुनाव मुकाबले से बाहर खड़ी हुई नजर आई। पूरे चुनाव के दौरान न तो अधिकांश बड़े पदाधिकारी और न ही अधिकांश पार्षद प्रचार में जुटे बल्कि वे लोग चेहरा छुपाने में अधिक मशगूल रहे। स्थिति इतनी बदतर थी कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में भाजपा को प्रचार के लिए कार्यकर्ता भी नहीं मिले तथा मतदान वाले दिन अधिकांश पोलिंग बूथों से भाजपा के कार्यकर्ता नदारद दिखे। जहां कार्यकर्ता भी थे उन्होंने दोपहर होते होते अपना डेरा समेट लिया। परंतु जनता ने तो कुछ और ठान रखी थी। शहर के 80 प्रतिशत से अधिक बूथों पर भाजपा प्रत्याशी केपी यादव ने जबरदस्त जीत दर्ज की। इस पर विधानसभा प्रभारी राजू बाथम की दलील है कि हमने प्रारंभ से फोकस उन हितग्राहियों पर केंद्रित किया  जिन्हें आवास योजना अथवा घरेलू गैस सिलेण्डर का उज्जवला योजना में लाभ मिला है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के अनुयायी बिरथरे ने लोधी वोटों पर ध्यान केंद्रित किया। पूरे चुनाव में नरेंद्र बिरथरे और राजू बाथम का अदभुत समन्वय बना रहा। हालांकि इससे कुछ कार्यकर्ताओं में असंतोष का वातावरण भी रहा और चुनाव के दौरान एक दूसरे के बीच खुन्नसबाजी भी मीडिया तक पहुंची। लेकिन इससे अप्रभावित शहरी इलाकों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी भाजपा को अच्छी लीड मिली। प्रचार की जिम्मेदारी अधिकांश छोटे कार्यकर्ताओं ने संभाली और बड़े बड़े पदाधिकारी कन्नी काटते हुए नजर आए, परंतु मोदी के पक्ष में अंडर करंट ने काम आसान कर दिया। चुनाव में मुख्य रूप से कामता खटीक, हेमंत ओझा, मुकेश चौहान, विमल मामा, तेजमल सांखला, राकेश राठौर, गणेश धाकड़, अनिल बघेल, कपिल मिश्रा, यशवंत जेन, अनुराग अष्ठाना, मदन बिहारी श्रीवास्तव, डॉ. राजेंद्र गुप्ता, राजू गुर्जर, मुकेश रघुवंशी, अमित भार्गव आदि कार्यकर्ता जुटे। जहां तक कोलारस विधानसभा क्षेत्र का सवाल है यहां से सिंधिया 3 हजार मतों से हारे। दिखने में यह आंकड़ा छोटा लगता है, लेकिन इसे पिछले चुनाव में सिंधिया की 29 हजार मतों से विजय के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कोलारस विधानसभा क्षेत्र में जिलाध्यक्ष सुशील रघुवंशी और विधायक वीरेंद्र रघुवंशी ने मुख्य रूप से कमान संभाली। पिछोर विधानसभा क्षेत्र में मोदी लहर के बावजूद भाजपा कांग्रेस के गढ़ को धराशायी नहीं कर पाई। 

मैं तो यहां से जीत का सर्टिफिकेट लेकर जाऊंगा : श्री बाथम
मतगणना केंद्र पर कांग्रेस नेता नरेंद्र जैन भोला और भाजपा के वरिष्ठ नेता राजू बाथम के बीच झड़प भी हो गई। बताया जाता है कि मतगणना केंद्र में पहले आकर श्री बाथम जम गए। इसके बाद जब कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती वहां आए तो श्री जैन ने भाजपा नेता बाथम से श्री भारती के लिए कुर्सी छोडऩे को कहा। इस पर श्री बाथम ने कहा कि मैं क्यों कुर्सी छोडूं। इस पर जवाब में नरेंद्र जैन ने कहा कि आप तो 11-12 बजे के बाद वैसे भी चले जाओगे हमें तो शाम तक बैठना पड़ेगा। यह सुनते ही श्री बाथम ताव खा गए और उन्होंने कहा सुन लो मैं यहां से जीत का प्रमाण पत्र लेकर ही जाऊंगा। यह गलतफहमी निकाल दो कि हम चुनाव हार रहे हैं और 12 बजते बजते श्री बाथम के चेहरे पर रौनक आ गई तथा कांग्रेस नेताओं के चेहरों पर हवाईयां उडऩे लगीं। 

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