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| दुर्गेश गौड़, आर्थिक विश्लेषक |
आज कल भारतीय मुद्रा की गिरती कीमत सुर्खियों में है। जो चालू वर्ष में अभी तक डॉलर के मुकाबले 4% तक कमजोर हो चुकी है। अर्थशास्त्रियों के मत में रुपया आगे भी 90 रूपय प्रति डॉलर के पार जा सकता है। रुपए की घटती कीमत की मूल वजहों में वैश्विक अनिश्चितता के चलते पूंजी का बहिर्गमन, अमेरिका द्वारा टैरिफ में वृद्धि, मुख्य आयतित जिंस कच्चे तेल का रूस से सस्ती खरीद पर बढ़ता अमेरकी दबाव, हमारा चालू खाता घटा एवं घटती वैश्विक मांग आदि प्रमुख हैं। उक्त वजहों का भविष्य में भी जारी रहना संभावित नजर आता है। अब प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में घटता रुपया व भविष्य में दिखती आसन्न गिरावट अर्थव्यवस्था में कमजोरी का सूचक है। या आर्थिक फंडामेंटलस कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। इस उलझन को आगे समझने से पहले एक नजर मुद्रा के बेसिक कॉन्सेप्ट पर डालते हैं।
मुद्रा एक माध्यम है जो किसी वस्तु या सेवा की कीमत को परिभाषित करती है व एक्सचेंज का काम करती है। अगर वस्तुऐं या सेवाऐं मुद्रा के सामने महंगी होने लगती हैं। तो हम इसे मुद्रा का अवमूल्यन या बढ़ती मुद्रा स्फीति मानते हैं। एवं इसके विपरीत वस्तुओं एवं सेवाओं की गिरती कीमत को मुद्रा में मजबूती या अबस्फीति मानते हैं। मुद्रा की वास्तविक इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (आरईईआर) से आशय मुख्य विदेशी मुद्राओ की वास्केट के वेटेज एवरेज के सामने महंगाई के समायोजन उपरांत रुपए का मूल्य। सामान्य अर्थ में किसी मुद्रा द्वारा अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में कितनी मात्रा में वस्तुओं व सेवाओं को क्रय किया जा सकता है। जो मुद्राओं की क्रय शक्ति में तुलनात्मक उतर चढ़ाव दर्शाता है। वहीं नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचैंज रेट (एनईईआर) क्रय शक्ति के तुलनात्मक अध्ययन के बिना, महंगाई को समायोजित किए वगैर सिर्फ मुद्रा की कीमतों का फर्क दर्शाती है। जैसे कि एक्सचेंज पर 1 डॉलर की कीमत 89 रूपए है। वस्तुओं एवं सेवाओं के संदर्भ में वास्तविक क्रय शक्ति के मूल्यांकन का पैमाना आरईईआर को माना जाता है।
रुपए के संदर्भ में अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आरईईआर के पैमाने पर त्वरित गिरावट के बाद भी रुपया अधिमूल्यित बना हुआ है।आरबीआई के हालिया सर्वेअनुसार आरईईआर भारांक 108.14 पर स्थित है, इस लिहाज से मुद्रा स्फीति को समायोजित करने के उपरांत रुपए का मूल्य 8.1% अधिमूल्यित है। जबकि ऐनईईआर पर चालू वर्ष में गिरावट 4% के आस पास है। कीमतों के संदर्भ में भारत की महंगाई दर पर भी गौर करना आवश्यक है। हमारी मुख्य महंगाई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 2% के अंदर है। जोकि 2 से 4 प्रतिशत, आरबीआई के कंफर्ट जोन से भी कम है। महंगाई की तुलना अगर सावधि जमा पर मिलने वाले ब्याज से करें तो रियल इंटरेस्ट रेट 5% तक सकारात्मक है। अर्थात रुपए की कीमत में गिरावट का असर उसकी क्रयशक्ति पर नगण्य है। व रुपए में होने वाली बचत भी सकारात्मक है। वहीं सर्वाधिक आयातित जिंस कच्चा तेल भी अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में गिरावट के बीच स्थित है। जो एक्सचेंज पर रुपए की गिरती कीमतों के बीच एक राहत की तरह है। वहीं अमेरिका द्वारा बढ़ाए जा रहे टैरिफ के बीच रुपए का घटता एक्सचेंज मूल्य निर्यातकों को प्रतियोगी लाभ दे रहा है। जहां देश से बाहर निवेश करना महंगे डॉलर के परिप्रेक्ष्य में महंगा है। वहीं सस्ता रुपया देश में आ रहे निवेश को सस्ता बना रहा है। जो चाइना प्लस वन के दौर में भारत को प्रतियोगी धार देता है। भारत का व्यापार घाटा काबू में है व आंतरिक घाटा भी बजट लक्ष्य के अनुरूप घट रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार अपने चरम के आस पास स्थिर है। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था भी अबतक की मजबूत स्थिति में है। आईएमएफ ने भी हाल ही में रुपए की विनिमय दर व्यवस्था को फ्लोटिंग श्रेणी में डाला है। जिसका आशय सरकार द्वारा मुद्रा की कीमतों में हक्तक्षेप न करना है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि रूपए की कीमत आरईईआर पर अपनी क्रय शक्ति में स्थिर है। व एक्सचेंज पर उसकी घटती एनईईआर कीमतें निर्यातकों एवं विदेशी निवेशकों के लिए लाभदायक हैं। अन्य मोर्चों पर अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति देश की अर्थव्यवस्था को मूल्यवान बनाए हुए है। अतः यहां मुख्य चुनौती मुद्रा की कमजोरी में छुपे मौकों को पहचानते हुए उसे आर्थिक ताकत में बदलने एवं लंबे दौर के आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने की है।







