सामग्री मिलने का बेबश भूखे प्यासे इंतजार करते बस चालक
केदार सिंह गोलिया
शिवपुरी। एक ओर जिले की मुखिया कलेक्टर श्रीमती अनुग्रह पी ने हाल ही में अपनी नेतृत्व क्षमता और बुद्धिमता से शांतिपूर्ण तरीके से सेना की भर्ती का आयोजन कराकर सभी को चौंका दिया था, लेकिन वहीं दूसरी ओर उन्हीं के अधीनस्थ शिक्षा विभाग के मुखिया जिला शिक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली पर आज उस समय सवाल उठ खड़े हुए जब आगामी मार्च माह में आयोजित होने वाली बोर्ड परीक्षाओं की सामग्री वितरण कर परीक्षा केन्द्रों के संबंधित थाने पर सुरक्षित रखवाना थी। इसके लिए जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा निजी स्कूल वालों को फरमान जारी करते हुए एक स्कूल से दो-दो बसें परीक्षा सामग्री पहुंचाने के लिए मंगवा लीं, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी का यह आदेश उस समय हिटरशाही फरमान में तब्दील होता दिखा जब सुबह से बस लेकर आए भूखे, प्यासे बेबश ड्रायवर दिनभर सामग्री का इंतजार करते रहे और देर रात्रि 10 बजे तक भी उन्हें सामान नहीं मिला। शिक्षा विभाग की यह घोर लापरवाही सामने आ रही है कि परीक्षा जैसी संवेदनशील सामग्री को रात के अंधेरे में दूरदराज, जंगली बीयावान क्षेत्र में पहुंचाने की क्या आवश्यकता है? अगर कोई दुर्घटना और अनहोनी हो जाए तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं जो कि शिक्षा विभाग की हठधर्मिता और लापरवाही को उजागर करता है। अगर आज ही सामग्री का वितरण होना था तो पूर्व से शिक्षा विभाग ने तैयारियां क्यों पूर्ण नहीं की, यह भी एक बड़ा सवाल है..?
केदार सिंह गोलिया
शिवपुरी। एक ओर जिले की मुखिया कलेक्टर श्रीमती अनुग्रह पी ने हाल ही में अपनी नेतृत्व क्षमता और बुद्धिमता से शांतिपूर्ण तरीके से सेना की भर्ती का आयोजन कराकर सभी को चौंका दिया था, लेकिन वहीं दूसरी ओर उन्हीं के अधीनस्थ शिक्षा विभाग के मुखिया जिला शिक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली पर आज उस समय सवाल उठ खड़े हुए जब आगामी मार्च माह में आयोजित होने वाली बोर्ड परीक्षाओं की सामग्री वितरण कर परीक्षा केन्द्रों के संबंधित थाने पर सुरक्षित रखवाना थी। इसके लिए जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा निजी स्कूल वालों को फरमान जारी करते हुए एक स्कूल से दो-दो बसें परीक्षा सामग्री पहुंचाने के लिए मंगवा लीं, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी का यह आदेश उस समय हिटरशाही फरमान में तब्दील होता दिखा जब सुबह से बस लेकर आए भूखे, प्यासे बेबश ड्रायवर दिनभर सामग्री का इंतजार करते रहे और देर रात्रि 10 बजे तक भी उन्हें सामान नहीं मिला। शिक्षा विभाग की यह घोर लापरवाही सामने आ रही है कि परीक्षा जैसी संवेदनशील सामग्री को रात के अंधेरे में दूरदराज, जंगली बीयावान क्षेत्र में पहुंचाने की क्या आवश्यकता है? अगर कोई दुर्घटना और अनहोनी हो जाए तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं जो कि शिक्षा विभाग की हठधर्मिता और लापरवाही को उजागर करता है। अगर आज ही सामग्री का वितरण होना था तो पूर्व से शिक्षा विभाग ने तैयारियां क्यों पूर्ण नहीं की, यह भी एक बड़ा सवाल है..?
भविष्य के गर्त में: शिक्षा विभाग की कारगुजरियों पर पड़ेगा पर्दा या फिर कलेक्टर आएंगी एक्शन मूड में...?
यहां बता दें कि शिक्षा विभाग का ढर्रा शिवपुरी जिले में बहुत ही बिगड़ा हुआ है क्योंकि न तो विभाग के आला अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी का भान है और न ही वरिष्ठ अधिकारियों के पास इनको लताड़ लगाने का समय। इसके कारण शिवपुरी जिले में शिक्षा का ढर्रा बिगड़ा हुआ है। अब देखना होगा कि परीक्षा जैसी संवेदनशील सामग्री के साथ लापरवाही के इस मामले में जिले की कलेक्टर कोई ठोस कदम उठाती हैं या फिर हमेशा की तरह इस लापरवाही पर भी पर्दा डाल दिया जाएगा..? फिलहाल इन सवालों के जबाव भविष्य के गर्त में छिपे हुए हैं यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा।
ओवरलोड बसों में नौनिहालों की जिंदगी, जिम्मेदार कौन...?
निजी स्कूल प्रबंधन की मानें तो आज सुबह से उनकी दो-दो बसों को शिक्षा विभाग द्वारा बुलवा लिया गया जिसके कारण क्षमता से अधिक बच्चों को बिठाकर उनके घरों तक छोड़ा गया। स्कूल संचालकों को आशंका है कि शिक्षा विभाग की लापरवाही से यही हालात अगले दिन के लिए भी बनते नजर आ रहे हैं क्योंकि जब पूरी रात्रि बस चालक बसों को चलाएंगे तो दूसरे दिन उनके द्वारा कार्य पर लौटना संभव नहीं होगा आखिर वह भी तो इंसान है। ऐसी स्थिति में मजबूरन स्कूल संचालकों के पास ओवरलोड वाहन चलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।
स्कूलों पर विभाग का अनैतिक दबाव, कार्यवाही के भय से ब्लैकमेल होते स्कूल संचालक
यहां बता दें कि परीक्षाओं के आयोजन के लिए बकायदा शासन द्वारा बच्चों से परीक्षा फीस जमा कराई जाती है। इस परीक्षा के आयोजन के लिए ड्यूटी पर तैनात शिक्षकों को बकायदा उन्हें कार्य के बदले भुगतान होता है, लेकिन इस कार्य के बदले निजी स्कूल संचालकों के साथ दोहरा रवैया अपनाया जाता है। स्कूल संचालकों की मानें तो पूरी कहानी यह है कि इस सामग्री के परिवहन हेतु शिक्षा विभाग द्वारा स्कूल संचालकों से बसें हैंडओवर की जाती है, लेकिन विभाग द्वारा सिर्फ बसों में डीजल डलवाया जाता है जबकि किराये के नाम पर कुछ भी नहीं दिया जाता है और यह खेल वर्षों से अनवरत रूप से जारी है। सूत्रों की मानें तो शासन से इन बसों का किराया भी दिये जाने का नियम है। लेकिन विभाग द्वारा कार्यवाही का भय दिखाकर सिर्फ डीजल में ही बसों का उपयोग किया जाता है। कुल मिलाकर विभाग द्वारा अनैतिक रूप से दबाव बनाकर स्कूल संचालकों को ब्लैकमेल होने पर मजबूर किया जाता है। वहीं शासकीय कार्य की बात करें तो चुनाव जैसे बड़े कार्य के लिए भी स्कूल बसों को लगाया जाता है वहां किराया मिलता है, लेकिन परीक्षा के दौरान नहीं। जबकि चुनाव के समय तो चुनाव आयोग द्वारा कोई राशि भी किसी से नहीं ली जाती है। फिर परीक्षा में बच्चों से फीस वसूलने के बाद भी अनैतिक दबाव का खेल क्यों...?
इनका कहना है
वितरण प्रक्रिया चल रही है एकाध घंटे में सभी को रवाना कर दिया जाएगा। पहले 68 केन्द्रों को सामग्री एकसाथ बॉक्स में मिल जाती थी और सभी अपना-अपना गिन लेते थे, लेकिन इस बार तीन लोगों द्वारा एक-एक गिनकर बंडल दिए जा रहे हैं इसलिए अधिक समय लग रहा है। केन्द्राध्यक्ष भी 12 बजे से पहले नहीं आते। सुबह तक सभी बसें वापस लौटा दी जाएंगी। अजय कटियार
जिला शिक्षा अधिकारी शिवपुरी
इनका कहना है
वितरण प्रक्रिया चल रही है एकाध घंटे में सभी को रवाना कर दिया जाएगा। पहले 68 केन्द्रों को सामग्री एकसाथ बॉक्स में मिल जाती थी और सभी अपना-अपना गिन लेते थे, लेकिन इस बार तीन लोगों द्वारा एक-एक गिनकर बंडल दिए जा रहे हैं इसलिए अधिक समय लग रहा है। केन्द्राध्यक्ष भी 12 बजे से पहले नहीं आते। सुबह तक सभी बसें वापस लौटा दी जाएंगी। अजय कटियार
जिला शिक्षा अधिकारी शिवपुरी







