गुना संसदीय क्षेत्र में 2014 की तरह इस बार भी देखने को मिला मोदी लहर का असर
शिवपुरी। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुकाबले बहुत अधिक कमजोर और आयतित उम्मीदवार केपी यादव को चुनाव मैदान मेंं उतारा तो मुकाबला एकतरफा लग रहा था। बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार लोकेंद्र सिंह राजपूत के कांग्रेस को समर्थन देने से कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया की जीत को सुनिश्चित आंका जाने लगा। भाजपा प्रत्याशी की तुलना में कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी धर्मपत्नि प्रियदर्शनी राजे सिंधिया संसदीय क्षेत्र में कहीं अधिक सक्रिय रहे। कांग्रेस की तुलना में भाजपा कार्यकर्ता उतनी तन्मयता से चुनाव प्रचार में नहीं जुटे। इससे लग रहा था कि कांग्रेस गुना संसदीय क्षेत्र में शायद इस बार जीत का नया रिकॉर्ड बना सकती है। लेकिन मतदान के दौरान जो फीडबैक निकलकर सामने आ रहा है उससे कांग्रेस की चिंताएं बढऩा स्वाभाविक हैं। भाजपा का आशावाद इस हद तक बढ़ा हुआ है कि यह पार्टी अब चमत्कार करने की बात भी करने लगी है।
आजादी के बाद से गुना शिवपुरी संसदीय क्षेत्र सिंधिया परिवार का ऐसा गढ़ रहा है जिसे कभी भी भेदा नहीं जा सका है। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा प्रत्याशी जयभान सिंह पवैया से 1 लाख 21 हजार मतों से पराजित हो गए हों, लेकिन दो विधानसभा क्षेत्रों शिवपुरी और गुना में उनकी पराजय से प्रसिद्ध सहित्यकार भीष्म साहनी की वह कविता बरबस याद आती है कि कौन कहता है कि आसमान में छेद हो नहीं सकता, एक पत्थर तबियत से उछालो तो भाई। जीत के बाद भी दो विधानसभा क्षेत्रों में 2014 में कांग्रेस की हार चौंकाने वाली और इस पार्टी को चिंता में डालने वाली है। यहीं कारण रहा कि सांसद सिंधिया इस बार तमाम अनुकूलता के बावजूद संसदीय क्षेत्र में पूरे समय सक्रिय रहे और उन्होंने अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। चुनाव में उन्होंने अपने विकास कार्यों को मुद्दा बनाया। वहीं सिंधिया परिवार से क्षेत्र की जनता के भावनात्मक रिश्तों को भी वोट में तब्दील करने की कोशिश की। जबकि भाजपा प्रत्याशी केपी यादव सिर्फ और सिर्फ मोदी लहर के सहारे अपनी नैया खेते रहे। भाजपा के राष्ट्रवाद के मुद्दे ने इस बार संसदीय क्षेत्र में बहुत अधिक प्रभाव डाला। मतदान के दौरान कई पोलिंग बूथों पर भले ही भाजपा कार्यकर्ता नहीं थे, लेकिन इसके बाद भी जो संकेत निकलकर सामने आ रहे हैं उससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने भाजपा को भी वोट दिया। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस संसदीय क्षेत्र में जीत का एक नया रिकॉर्ड कायम कर पाएगी। लेकिन ऐसा तो नजर नहीं आता। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग यह तो मानता है कि गुना संसदीय क्षेत्र में चमत्कार होने की संभावनाएं काफी क्षीण हैं। साथ ही कांग्रेस को पराजित करना बेहद कठिन कार्य है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने जो लगभग सवा लाख मतों की जीत हासिल की थी उस तक पहुंचना कांग्रेस के लिए एक उपलब्धि होगी।








