सिंधिया को घेरने की चाल या वीरेन्द्र रघुवंशी को बाहर बैठानेे का उपक्रम या केपी सिंह के खिलाफ पार्टी केे भीतर षडयंत्र
शिवपुरी। कांगे्रस की शिवपुरी जिले की विधानसभा सीटोंं मेंं शिवपुरी से पूर्व मंत्री और पिछोर विधायक केपी सिंह का नाम चौकाने वाला है। पिछोर सीट पर भी आश्चर्यजनक रूप से शैलेन्द्र सिंह की उम्मीदवारी कई तरह के सवाल खड़़ा कर रही है। यह निर्णय इसलिए भी आश्चर्यजनक है कि कांंग्रेस बार-बार कहती रही है कि पार्टी इस बार सर्वे रिर्पाेट के आधार पर टिकिट देगी। जबकि शिवपुरी से न तो केपी सिंह और न ही पिछोर से शैलेेन्द्र सिंह के नाम पर कांग्रेस ने सर्वे नहीं कराया है। पिछोर सीट से छ: बार से जीत रहे केपी सिंंह की उम्मीदवारी बिल्कु ल निश्चित मानी जा रही थी और शिवपुरी सीट पर कांग्रेस के पास दावेेदारों की कोई कमी नहीं हैं। दावेदारोंं की इस कदर लाइन लगी हुई थी कि भाजपा विधायक वीरेन्द्र रघुवंशी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जितेन्द्र जैन गोटू औैर राकेश गुप्ता जैसे मजबूत भाजपाई टिकिट की आस में कांग्रेस मेंं आ गये। पार्टी के पास निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भी कोई कमी नहीं थी। फिर आखिर कैसे ये दोनोंं नाम सूची में स्थान पाने में सफल रहे,यह सवाल राजनैतिक हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांग्रेस के अंदरखाने में एक चर्चा यह चल रही है कि शिवपुुरी सीट पर के न्द्रीय मंंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की उम्मीदवारी की चर्चा चल रही है और सिंधिया की घेराबंदी करने के लिए कांग्रेस ने केपी सिंह की उम्मीदवारी घोषित की है। केपी सिंह जिलेे की पिछोर सीट से 1993 से चुनाव जीत रहे हैं और भाजपा की लहर में भी उन्होंने कांग्रेस की जीत का परचम फ हराया है। हालांकि पिछले दो विधानसभा चुनाव मेें उनकी जीत का अंतर घटा है और दोनों बार उन्हेंं भाजपा प्रत्याशी प्रीतम लोधी से कड़े संघर्ष का सामना करना पड़़ा हैं। 2018 केे विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर घटकर सिर्फ ढाई हजार मतों का रह गया था। इस बार फिर प्रीतम लोधी भाजपा उम्मीदवार हैं। यह भी सवाल है कि क्या प्रीतम लोधी से घवराकर केपी सिंह पिछोर छोड़कर शिवपुरी आए हैं। वहीं यह भी चर्चा है कि कांग्रेस ने उनके नाम का ऐलान सिंधिया की शिवपुरी से संभावित उम्मीदवारी के चलते किया है तांकि सिंधिया की घेराबंंदी की जा सके या फिर केपी सिंह का नाम सुनकर सिंधिया खुद शिवपुरी से चुनाव लडऩे से मना कर दें। सवाल यह हैं कि क्या पिछोर की तरह केपी सिंह शिवपुरी मेंं कांग्रेस के एक मजबूत उम्मीदवार हैं। क्या वह वीरेन्द्र रघुवंंशी और जितेन्द्र जैन गोटू से अधिक शिवपुरी में प्र्रभाव रखते हैं। वीरेन्द्र रघुवंशी और जितेन्द्र जैन की शिवपुरी कर्म स्थली है जबकि केपी सिंह की जन्म और कर्म स्थली दोनों पिछोर हैं। शिवपुरी मेंं राजनैतिक रूप से वह अधिक सक्रिय नहीं रहे हैं। हर वर्ष शिवपुरी मेंं वर्षा ऋतु में वह एक सामूहिक भोज अवश्य आयोजित करते हैं। सिर्फ इसी गोट में उनका लोगों से मिलना जुलना होता है। इसके अलावा सामाजिक रूप से उनका जुड़ाव शिवपुरी में अधिक नहीं हैं। लेकिन केपी सिंह का नाम बड़़ा है और उनसे उपक ृृत होने वाले कार्यकर्ता भी शिवपुरी मेंं हैं। चार बार से शिवपुरी से भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत रहीं यशोधरा राजे सिंधिया के चुुनाव लडऩेे से इंकार करने के कारण केेपी सिंह को लगा हो कि यह क्षेत्र पिछोर की तुलना में उनके लिए अधिक ठीक रहेगा। लेकिन यह भी सच्चाई है कि शिवपुरी सीट भाजपा की सुरक्षित सीटों मे से एक है और इसे कांग्रेस के पाले में लाना आसान नहींं होगा। कांग्रेेस प्र्रत्याशी के रूप में ज्योतिरादित्य सिंंधिया पिछले लोकसभा चुनाव मेंं लगभग 28 हजार मतों सेे इस क्षेत्र से पराजित हुए थे। इस क्षेत्र में पिछले दिनों पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी काफी सक्रिय रहें हैंं और यहां की नब्ज को उन्होंने पहचान हैे। क्या केपी सिंह की उम्मीदवारी को उन्होंनेे उपयुक्त माना है यह भी एक सवाल है। क्षेत्र में दो चर्चायें और हैं- यह हैं वीरेन्द्र रघुवंशी को रोकने के लिए केपी सिंह शिवपुरी आयें हैं और दूसरी चर्चा यह हैं कि कांंग्र्रेस की गुटबाजी के चलते उन्हे शिवपुरी से उतारा गया है। उनके खिलाफ पार्टी में एक वर्ग मुुखर है यह तब जाहिर हुआ था जब 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी और पात्रता के बावजूद उन्हें मंंत्री नहींं बनाया गया था।
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सिंंधिया शिवपुरी से नहीं लड़े तो क्या केपी की पिछोर वापिसी होगी
शिवपुरी में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यदि भाजपा ने शिवपुरी सेे ज्योतिरादित्य सिंधिया को उम्मीदवार नहीं बनाया तो केपी सिंह पिछोर जा सकते हैं और शिवपुुरी सीट से वीरेन्द्र रघुवंशी जितेन्द्र जैेन और जिनेश जैन में से किसी को टिकिट दिया जा सकता है। टिकिट बदलवाने को लेकर वीरेन्द्र रघुवंशी सक्रिय हो गए हैं।
मुझेे कुचक्रों के जाल में फंसाया गया है: वीरेेन्द्र रघुवंशी
शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र सेे कांग्रेस टिकिट से बंचित विधायक वीरेन्द्र रघुवंशी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर कहा है कि उन्हें कुुचक्रों के जाल में फंंसाया गया है। वीडियो में उन्होंने कहा कि मेरा जीवन संघर्षोंं में गुजरा है और यह संघर्ष मैनेे आपके विकास और प्रगति के लिए किया है। वर्तमान में मुुझे फिर कुचक्र मे फं साया गया है। उन्होंंने कहा कि मुझे उम्मीद है कांग्रेस का शीर्ष नेतृृत्व इस ओर ध्यान देगा और मैं कुचक्रों के जाल से बाहर निकल सकूंगा। श्री रघुवंशी टिकिट न मिलने के बाद सक्रिय हो गये हैें और पहले वह दिल्ली और फिर भोपाल कूच कर गए हैं।
पोहरी से कैलाश और कोलारस से बैजनाथ को मिला टिकिट
कांग्रेस ने पोहरी से कैलाश कुशवाह और कोलारस से बैजनाथ ंिसंंह यादव को टिकिट दिया हेै। बैजनाथ सिंंह यादव दो माह पहले ही भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आये थे और कैलाश कुशवाह एक वर्ष पूर्व बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे।







