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ऐसा चाहु राज में मिले सभी को अन्य, ऊंच-नीच सब सम बसे रहे रविदास प्रसन्न: सुमन बौद्ध

बिजरौनी में हुआ संत शिरोमणि रविदास महाराज की कथा का समापन
शिवपुरी। बदरवास के ग्राम बिजरौनी में 2 फरवरी से प्रारंभ संत शिरोमणि रविदास महाराज की कथा का समापन भजन संध्या के साथ किया गया। कथा का श्रीश्री 108 श्री प्रकाश गिरी महाराज द्वारा कथा का वाचन किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्घालु मौजूद थे। समापन पर आयोजित भजन संध्या में कथा वाचक समुन प्रताप बौद्ध, ने भजन की प्रस्तुति देते हुए कहा कि ऐसा चाहु राज में मिले सभी को अन्य ऊंच-नीच सब सम बसे रहे रविदास प्रसन्न अर्थात संत शिरोमणि रविदास ने कहा है कि मानव हित में सर्वजन के कल्याण के लिए सुखी जीवन के लिए जो उनके जीवन के लिए व्यक्तित्व को अच्छे से समझने के लिए काफी है। इसके बाद उन्होंने अन्य भजनों की प्रस्तुति व उनका अर्थ बताया गया। इसमें उन्होंने कहा कि बहुजन समाज में जो महापुरुष हुए हैं, उन्होंने मानवता का संदेश दिया है। कभी भी किसी धर्म जाति, देवी देवताओं का उपहास व विकासखंड नहीं किया गया है। मानव कल्याण के लिए अंध विश्वास, पाखंडपन, बुराई, नशा इनका दूर करने का भरसक प्रयास किया है। निशा बौद्ध एवं इनकी मंडली के आठ सदस्यों द्वारा ग्राम बिजरौनी के मिडिल स्कूल के पास रंगा रंग कार्यक्रम पूरी रात प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम में गांव सहित आस-पास के लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नरेंद्र कुमार आर्य पूर्व डीएसपी, अध्यक्षता जयपाल सिंह यादव उर्फ भोला यादव सरपंच, कृष्णभान यादव पूर्व सरपंच, बालकृष्ण महोदिया थे। इसमें गोपाल सिंह शिक्षक शिक्षक, सोनू आचार्य, करतार सिंह, अगर सिंह, इमरत सिंह, बालक राय टेलर, पीतम सिंह, दिनेश, लालाराम, कन्हैयाराम पूर्व सरपंच, भटोलाराम, गोपाल सिंह जाटव, दयाराम जाटव, सोडूराम, भगत, मुनेश परिहार, बृजगोपाल यादव, हरवीर सिंह, प्रसन्नजीत, देवीचरण, कैलाश बौद्ध सहित डॉ. भीमराव अंबेडकर समिति के सदस्य मौजूद थे।

मन चंगा तो कठौती में गंगा: नरेन्द्र आर्य
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नरेंद्र कुमार आर्य सेवानिवृत्त डीएसपी ने कहा कि संत शिरोमणी रविदास जी 15वीं शताब्दी के ऐसे महान संत हुए जिन्होंने बताया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा अर्थात् जिस व्यक्ति का मन पवित्र होता है, उसके बुलाने पर मां गंगा भी एक कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरे पात्र) में भी आ जाती हैं। उन्होंने साफ़ किया कि भगवान और मंदिर की ज़रुरत इंसान को रोटी और मानवीयता से ज्यादा नहीं है। श्री आर्य ने कहा कि रविदास जी ने सिखाया कि आदमी को हमेशा कर्म करते रहना चाहिए, कभी भी कर्म के बदले मिलने वाले फल की आशा नही छोडऩी चाहिए, क्योंकि कर्म करना मनुष्य का धर्म है तो फल पाना हमारा सौभाग्य। इस प्रकार संत रविदास जी ने हमें जीवन की सही राह दिखाई जिस पर चलकर हम भी अपने जीवन में सुखी और प्रसन्न रह सकते हैं।

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